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कलाम आख़री हम समझ ना सकें

कलाम आख़री हम समझ ना सकें,
कुछ ऐसी ही शुरुआत तुम कर दो…
वैसे तो क़ाबिल हम नही तुम्हारे,
नाम हमारे ही हमारी ज़िंदगानी तुम कर दो…
खुशी के रंगों से तो लैस है दामन तुम्हारा,
हमारी ही हमारे अंधेरों की कालिख तुम कर दो…
बेहतरी को माहताबी तुम्हारे बदन से लिपटाये जाएं हम,
थोड़ा ही सही बस हमें बर्बाद तुम कर दो…
साँस ली जाती नही अब, के दिल बीमार है,
‘हम्द’ कह दो उनसे की इक नज़र की दवा तुम कर दो….

—-सुधीर कुमार पाल ‘हम्द’

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