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ज़ाफरान-ए-क़ब्र देखा तो आँखों ने नूर छोड़ दिया

ज़ाफरान-ए-क़ब्र देखा तो आँखों ने नूर छोड़ दिया,
अज़ाब-ए-क़ब्र सुना तो कानों ने लफ़्ज़ छोड़ दिया…
किस मुँह से कहें फ़ौलाद-ए-आदम हुए हम,
क़ज़ा की हुई आहट और दिल ने ख़ून छोड़ दिया…
परखी ‘हम्द’ जो मय्यत की परेशां-हाली,
रूह ने अक़्स-ओ-बदन-ए-सवाब छोड़ दिया…

—-सुधीर कुमार पाल ‘हम्द’

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